पैडमैन’ के मैसेज के साथ गांवों में पहुंचीं ‘पैडगर्ल’


जनता की आवाज़ (विकाश शुक्ला )

हाजीपुर: महिलाओं के बेहतर स्वास्थ्य की सीख की अलख जो बॉलीवुड अभिनेता अक्षय कुमार ने अपनी फिल्मी के किरदार ‘पैडमैन’ के जरिए जगाई उसकी रौशनी अब गांव—गांव में फैल रही है. तमाम झिझक और परंपराओं से बंधी गंवई महिलाओं और किशोरियों को उनके हाईजीन के प्रति जागरूक करने हाजीपुर की सोशल वर्कर सरिता राय भी दूर—दराज के गांवों में ‘पैडगर्ल’ बनकर पहुंच रही हैं.
देश भर में महिलाओं की जागरूकता के मिशन को सामाजिक कार्यकर्ता आगे बढ़ाते रहे हैं. शिक्षा, स्वास्थ्य और खुद के अधिकारों को लेकर अवेयरनेस की इन कंपेन में से एक वह भी थी, जिसे बॉलीवुड एक्टर अक्षय कुमार ने अपनी फिल्म ‘पैडमैन’ के जरिए देश भर में प्रचारित किया. रूढ़ीवादी परंपराओं और झिझक की गिरफ्त से महिलाओं और किशोरियों को आजाद करा उन्हें अच्छे स्वास्थ्य की पहल करने वालों को सलाम करने वाली यह फिल्म देश भर में चर्चा का सबब बनी हुई है.


सैनिटरी पैड की इसी मुहिम को आगे बढ़ाने का काम हाजीपुर की सोशल एक्टिविस्ट सरिता राय भी कर रही हैं. इलाके के दूर—दराज के गांवों में कूड़ा—कचरा चुनने और मैले कुचैले परिवेश के साथ मजदूरी करने वाली किशोरियों व युवतियों के बीच ‘पैडगर्ल’ बन जागरूकता की मशाल जला रही हैं. अशिक्षा की शिकार इन गंवई महिलाओं व किशोरियों को सैनिटरी पैड देने के साथ उन्हें इसके इस्तेमाल से बेहतर स्वास्थ्य की जानकारी दे रही हैं.


हाजीपुर के बड़ी युसूफपुर में गरीब और बेसहारा बच्चों के लिए स्टडी प्वाइंट ‘उड़ान’ संचालित करने वाली सरिता राय की इस मुहिम में उनका साथ संस्कृति फाउंडेशन की आकांक्षा भटनागर भी दे रही हैं. बता दें कि ‘उड़ान’ की शुरूआत सरिता राय ने कई वर्षों पहले की थी. कूड़ा—कचरा चुनने और बाल मजदूरी करने वाले बच्चों को शिक्षा देने का काम सरिता राय इस स्टडी प्वाइंट के जरिए कर रही हैं. मौजूदा समय में तकरीबन 100 बच्चे इसके जरिए अपने अंदर के अज्ञानता के अंधकार को दूर कर रहे हैं.

सरिता राय बताती हैं कि गांवों की महिलाओं और बच्चियों को सैनिटरी पैड की जानकारी ही नहीं है. जिन्हें है भी वे इसे गांव से कई किलोमीटर दूर के बाजारों से लाने में असमर्थ हैं. इतना ही नहीं पंरपराओं और शर्म और झिझक की वजह से वे इसे मंगा भी नहीं पाती हैं. सरिता राय कहती हैं कि ऐसे में ये महिलाएं और बच्चियां मजबूरन मैले—कुचैले कपड़ों और राख और सूखे पत्तों का सहारा लेती हैं. जबकि पीरियड्स ही नहीं आम दिनों में भी यह तरीका सेहत के लिहाज से खतरनाक होता है.
सरिता का यह भी कहना है कि ऐसी ही महिलाओं व बच्चियों के अंदर की झिझक तोड़ने और सेहत को ध्यान में रखते हुए सैनिटरी पैड के इस्तेमाल की जागरूकता का काम वे कर रही हैं. इसमें संस्कृति फाउंडेशन भी उनका सहयोग कर रही है

बिहार के हाजीपुर की इस कर्मठ समाजसेवी, बेटी सरिता राय, जो विपरीत परिस्थितियों के बावजूद झुग्गी झोपडी में रहने वाले बच्चों को जो कूड़ा कचड़ा चुनने, मैले कुचैले व निरक्षरता के बीच बाल मजदूरी करने को मजबूर अपनी जिंदगी बसर कर रहे हैं उन गरीब और छोटे बच्चों के भविष्य को सँवारने का कार्य कर रही हैं सरिता । सरिता के अपने आर्थिक कमाई से से इनके द्वारा चलाऐ जा रहें टॉपर स्टडी पॉइंट “उड़ान” क्लास जहाँ आज पढने वाले बच्चों की संख्या 100 के पार हो चुकी है.
खबर संकलन के दौरान यहाँ शिक्षा का अलख जगाने वाली सरिता राय से इनके ये नौनिहाल छात्र मानो यही कह रहे थे कि ‘तुम बाल दिवस का जशन मनाते हो, हमे तो पता ही नहीं हमारा भी कोई दिन होता है। सरिता से पढने को आने वाले बच्चों ने आज ने मुझे ये कहा कि इन्हें बाल मजदूरी भी करना पड़ता है .. काश इनको भी पता होता चिल्ड्रेन्स डे का मतलब।. वहीँ सरिता राय ने कहा कि हमारी संस्था की पूरी कोशिश है कि इन बच्चों को ये अहसास हो की बाल दिवस उन्ही के लिए है ताकि बाल मजदुरी से ये बाहर निकले और ‘पढोगे तो आगे बढोगे’ का सपना साकार हो सकेगा जिसके लिए सरिता की शिक्षण संस्था पूरी कोसिस कर रही इनकी मदद करने में।

सरिता कहती हैं शिक्षादान से बड़ा कोई महादान नहीं, सरिता आगे कहती हैं कि वैसे तो हमारे शास्त्रों में कई तरह के दान का वर्णन है. कोई अन्नदान करता है, तो कोई देहदान कर देता है. कोई वस्त्रों का दान करता है तो कोई रक्तदान को महादान मानता है. हमारी सोसायटी में हम सभी को कई ऐसे दानवीर मिल जाएंगे जो किसी न किसी वजह से कुछ न कुछ दान करते हैं

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