गुरूग्राम से निकला भारत का हीरो...शहादत का मिला ऐसा सिला


विकाश शुक्ला 

बहुत दिनों से लगातार अपने जाबाज़ जवानों की शहदत को देखकर मेरी आँखे नम हो जाती है,कल फिर से एक बार आँखे भर आई जब कैप्टन कपिल कुंडू और साथी जवानों का शव उनके घर पंहुचा

तिरंगे से लिपटा कैप्टन कपिल कुंडू, राइफलमैन राम अवतार, हवलदार रोशन लाल और शुभम सिंह का शव जब उनके परिवार के सामने आया, तब हर किसी की आंखें नम थीं. इन नम आंखों की वजह साफ थी कि इस परिवार ने अपने लाल को खो दिया. एक परिवार ने अपना सहारा खो दिया तो एक बहन ने डोली को कांधा लगाने वाले भाई को हमेशा के लिए खो देने की वेदना उसके कलेजे को चीर रही थी. उन्हें खो देने का गम भले ही उनके दिलों—दिमाग को साल रहा हो, लेकिन उस परिवार और देश के तमाम लोगों का सिर इन शहीद जांबाजों ने फख्र से उंचा कर दिया. समूचा देश इन वीरों की शहादत को सलाम कर रहा है.  कैप्टन कपिल कुंडू, राइफलमैन राम अवतार और हवलदार रोशन लाल ने उन द्रेशद्रहियों के मुंह पर भी करारा तमाचा जड़ दिया, जो कश्मीर में रहकर भारत के खिलाफ नारे लगाते हैं. यह तमाचा उनके मुंह पर है जो चंद कागज के टुकड़ों के लिए देश से गद्दारी करते हैं. ये जांबाज भी चाहते तो ऐशो—आराम में अपनी जिंदगी बिताते, लेकिन उन्होंने देश से नमक हरामी की बजाए अपने वतन के लिए नमक हलाल बन अपनी जान की बाजी लगाना मिशन बनाया. महज 22 साल की उम्र में उन्होंने वह कर दिखाया, जिस पर आज देश के तमाम बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों का सीना गर्व से चौड़ा कर दिया. उन्होंने अपने देश की आन—बान और शान के लिए मर—मिट कर उन तमाम युवाओं के भी रोल मॉडल बन गए जो अपने दिलों में अपने वतन के लिए कुछ करने का जज्बा रखते हैं.

अफसोस, इस बात का कि जिस जांबाज की शहादत को पूरा देश सलाम कर रहा है. उसी के अपने शहर गुरुग्राम में बैठे आला अफसरान अपनी जगह से हिलना भी मुनासिब नहीं समझा. हालांकि इस वीर को सलामी देने के लिए हरियाणा पुलिस की एक टुकड़ी जरूर वहां पहुंची, लेकिन यह महज खानापूर्ति ही कहलाएगी. हरियाणा सरकार के मुखिया एमएल खट्टर भी नहीं पहुंचे तो उनके अफसरों से भी और क्या उम्मीद की जा सकती है.  प्रशासनिक अमला आया था, वो चाहते थे कि ये सम्मान सुबह दिया जाए, ताकि उनकी तस्वीरें सही से मीडिया में लहरा सकें. 24 घंटे के बीत जाने के बाद भी गांव के लोगों और परिवार ने सरकार और प्रशासन के इस रवैए पर नाराजगी जाहिर करते हुए अपने जांबाज लाल को अंतिम विदाई आज ही करने का ऐलान कर दिया. यह बेहद शर्मनाक है उस पार्टी की सरकार के लिए जो राष्ट्र और सैनिकों की अस्मिता की वकालत करते नहीं थकती.

देश के जांबाज किसी सरकारी या प्रशासनिक सलामी के मोहताज नहीं. वे अपने देश के लिए बदस्तूर अपनी जान की बाजी लगाते रहेंगे, शहादत करते रहेंगे. लेकिन, सवाल यह भी है कि आखिर कब तक भारतीय जवानों के घर के आंगन के हर कोने में सूनापन पसरा रहेगा. सियासतदारों को जरा इन शहीदों के आंगन में भी झांक कर देखना चाहिए...यहां चीख—पुकार और सूनी आंखों में छिपे दर्द और मलाल को पढ़ना होगा. इसे पढ़ेंगे तो इसमें छिपा यह सवाल भी आपको कचोटेगा कि क्या देश की सेना के ये जवान बलिदान होने के लिए हैं या फिर बलि होने के लिए.  शहीद होने वालों के परिजनों की सरकार से यही गुजारिश है कि जल्द से जल्द कार्रवाई करें…लेकिन, सरकार का हर बार का रटा-रटाया जवाब कि व्यर्थ नहीं जाएगा शहीदों का बलिदान...इस बार भी सरकार से यही जुमला सुनाई दिया, जो हर बार दोहराया जाता रहा है.. बस चेहरे का फर्क है....लेकिन, न हालात बदले और ना ही पड़ोसी देश, जो सुधरने का नाम नहीं ले रहा है.

शहीद हुए चार जवानों के शव उनके घर पहुंच गये हैं..और उनकी अंतिम विदाई भी हो चुकी है हर किसी की आंखें नम है लेकिन नम आखों में गर्व का वो प्रकाश है जो इन शहीदों ने फैलाया है..शहीद कैप्टन कुंडू का पार्थिव शरीर जब उनके घर पहुंचा तो उनकी मां ने कहा कि हमें अपने अपने बेटे पर गर्व है, ये दुर्भाग्य है कि नेताओं के पास शहीदों के परिजनों से मिलने तक का समय नहीं है..लेकिन ये नेता मुजफ्फरनगर और कासगंज दंगे की निंदा करते हैं.. तो दादरी कांड में रातो—रात मौजूदगी दर्ज कराते है…लेकिन पाकिस्तान की हरकत पर एक शब्द तक नहीं बोलते हैं.

पीएम बनने से पहले नरेंद्र मोदी हर रैली में कहते थे कि एक सिर के बदले 100 सिर लाएंगे..लोगों ने मोदी को पीएम बनाया..लेकिन पीएम भी देश के शहीदों को इंसाफ दिलाने में नाकाम साबित हो रहे हैं.. इसलिए देश मोदी जी से गुहार लगा रहा है कि कार्रवाई करिए..शहीदों को इंसाफ दिलाइए….वरना... 2019 में कार्रवाई हम करेंगे.
कल फिर वो मनहूस दिन आया, जब देश के गरिमा को एक बार फिर ठेस पहुंचा..पर इस बार सरहद पार से आतंकियों ने अपनी काली करतूत से 4 घर को सूना कर दिया..चारो मां से उनका बेटा छीन लिया…देश के 4 जबांज सपूत हमेशा के लिए खामोश हो गए..लेकिन उनकी शहादत पर देश के बच्चे-बच्चे को गर्व है…देश की हर नम आखें उनकी शहादत को सलाम करती है….लेकिन आखिर कब तक ऐसे ही देश के सपूत अपनी जान की आहूति देते रहेंगे..कब तक देश के परिवार अपने बेटे, भाई, पति को खोते रहेंगे..आखिर खून की होली कबतक चलेगी…ऐसे कई सवाल है जो सूने घर के आंगन की दीवार चीख कर कह रही है…..
ऐसे में कई सवाल उठते हैं…क्या ऐसे संवेदनशील मामले की राजनीतिकरण जायज़ है ? क्या आतंकवाद को मजहब से जोड़ा जाना सही है ? आतंक तो बस सराभत के चौला में हौवानित का दूसरा नाम है…तो हम इस जंग में एक साथ क्यूं नहीं ? बड़ा सवाल है अब सरकार को हल करना ही होगा

सिर्फ 22 वर्ष उम्र देश के लिए शहीद हुए देश के वीर जवान "कैप्टन कपिल कुंडु" के अंतिम विदाई वक्त के तस्वीर।
"कैप्टन कपिल कुंडु" की लिखी गई कविता
यूं ही नहीं ये वादियां जन्नत कहलाती है।
आज भी खड़ी है रूह-ए-आशिक इन सरहदों पे,
आजमाना है किसी को अपना जोर तो आए।
पूछा खुदा ने काफी कत्ल किए हैं उस जहां में
बोला, आशिक-ए-वतन हूं, गुनाहों की हर सजा मंजूर है
करके नम अपने चश्म, बोले निजाम-ए-आलम
ऐसे दलेर आशिक से पहली दफा पाला पड़ा है।
बोला, खुदा कतार बहुत लंबी है अभी आनेवालों की,
कमी नहीं है मेरे मुल्क में उस मर मिटने वालों की।

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